ग़म के हर एक रंग से मुझको शनासा कर
ग़म के हर एक रंग से मुझको शनासा कर गया वो मेरा मोहसिन मुझे पत्थर से हीरा कर
ग़म के हर एक रंग से मुझको शनासा कर गया वो मेरा मोहसिन मुझे पत्थर से हीरा कर
ग़म है वहीं प ग़म का सहारा गुज़र गया दरिया ठहर गया है किनारा गुज़र गया, बस ये
दिल के बहलाने का सामान न समझा जाए मुझको अब इतना भी आसान न समझा जाए, मैं भी
मैं एक काँच का पैकर वो शख़्स पत्थर था सो पाश पाश तो होना मेरा मुक़द्दर था, तमाम
ख़ुद आगही का अजब रोग लग गया है मुझे कि अपनी ज़ात पे धोका तेरा हुआ है मुझे,
सबब ए चश्म ए तर कैसे बताऊँ तुझे ? ज़ख़्म ए दिल ओ जाँ कैसे दिखाऊं तुझे ?
दिल किस के तसव्वुर में जाने रातों को परेशाँ होता है ये हुस्न ए तलब की बात नहीं
दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब आन मिलो तो बेहतर हो इस बात से हम को
दिल इश्क़ में बे पायाँ सौदा हो तो ऐसा हो दरिया हो तो ऐसा हो सहरा हो तो
वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया लिबास पहने रहा और बदन उतार गया, हसब नसब