मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे
मुक़द्दर में चलना था चलते रहे,
कोई फूल सा हाथ काँधे पे था
मेरे पाँव शोलों पे चलते रहे,
मेरे रास्ते में उज़ाला रहा
दीये उस की आँखों के जलते रहे,
वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे,
मुहब्बत, अदावत, वफ़ा, बेरुखी
सब किराये के घर थे बदलते रहे,
सूना है उन्हें भी हवा लग गई
हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे,
लिपट के चरागों से वो सो गए
जो फूलों पे करवट बदलते रहे..!!
~बशीर बद्र
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