कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो

कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो
किसी भी अप्सरा से गुफ़्तुगू न हो,

क़ज़ा हुआ है एक जिस्म ए बे तरह
कहीं हमारी आँख बे वज़ू न हो,

हथेलियों में भर के बात तो करें
चराग़ को मुकालमे की ख़ू न हो,

दमक रहा है केसरी हिजाब से
इस आईने में कोई हू ब हू न हो,

मैं क्या करूँगा रह के इस जहान में
जहाँ पे एक ख़्वाब की नुमू न हो..!!

~आमिर सुहैल

दिल यार का तख़्त हुआ ही नहीं

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