हम ने फूलों को जो देखा लब ओ रुख़्सार के बाद
फूल देखे न गए हुस्न ए रुख़ ए यार के बाद,
काम नज़रों से लिया अबरू ए ख़मदार के बाद
तीर मारे मुझे उस शोख़ ने तलवार के बाद,
जिस पे हो जाएँ फ़िदा कोई भी ऐसा न मिला
सैकड़ों देखे हसीं आप के दीदार के बाद,
दिलरुबाई की अदा यूँ न किसी ने पाई
मेरे सरकार से पहले मेरे सरकार के बाद,
ज़िंदगी मौत से कुछ कम न थी ऐ जान ए हयात
तेरे इक़रार से पहले तेरे इंकार के बाद,
दिल ओ जाँ कर के फ़िदा उनको बनाया अपना
इश्क़ के खेल में जीत अपनी हुई हार के बाद,
चैन फिर और कहीं पा न सके ऐ पुरनम
हम ज़माने में फिरे कूचा ए दिलदार के बाद..!!
~पुरनम इलाहाबादी