हिज़ाब तेरे चेहरे पर आ मैं सजा दूँ
बाग़ ए इरम की तुझे मैं हूर बना दूँ,
कभी दाग़ आये न आँचल में तेरी
आ अपने रूह के दामन में छुपा दूँ,
हो अगर जो कभी राहे दुश्वार तेरी
राहो में तेरी अपनी पलके बिछा दूँ,
आज़माना जो चाहे तू इश्क़ हमारा
कह के देख ख़ुद को सूली चढ़ा दूँ,
वार कर के सब तुम पे ऐ ज़रीन
आ तुझे मैं हर एक दर्द की दवा दूँ..!!
~नवाब ए हिन्द
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गो ख़ाक हो चुका है हिन्दोस्ताँ हमारा

सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ

हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है…

ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था

इश्क़ में जान से गुज़रते है गुज़रने वाले…

सच बोलने के तौर तरीक़े नहीं रहे

वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी…

सीधे साधे लोग थे पहले घर भी सादा होता था

हादसों का शहर है संभल जाइए

भीतर भीतर आग भरी है बाहर बाहर पानी है
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