हिज़ाब तेरे चेहरे पर आ मैं सजा दूँ
बाग़ ए इरम की तुझे मैं हूर बना दूँ,
कभी दाग़ आये न आँचल में तेरी
आ अपने रूह के दामन में छुपा दूँ,
हो अगर जो कभी राहे दुश्वार तेरी
राहो में तेरी अपनी पलके बिछा दूँ,
आज़माना जो चाहे तू इश्क़ हमारा
कह के देख ख़ुद को सूली चढ़ा दूँ,
वार कर के सब तुम पे ऐ ज़रीन
आ तुझे मैं हर एक दर्द की दवा दूँ..!!
~नवाब ए हिन्द
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बस एक बार किसी ने गले लगाया था

मेरी आँखों में तेरे प्यार का आँसू आए

परिंदा समझ कर शिकार कर गई

एक हकीकी ख़्वाब हुआ तेरा साथ सराब हुआ…

दूसरा फ़ैसला नहीं होता

ख़ुद हो गाफ़िल तो अक्सर ये भी भूल जाते है

ज़िंदगी दी है तो जीने का हुनर भी देना

जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद

सुख़नवरी का बहाना बनाता रहता हूँ…

एक जाम खनकता जाम कि साक़ी…



















