हिज़ाब तेरे चेहरे पर आ मैं सजा दूँ
बाग़ ए इरम की तुझे मैं हूर बना दूँ,
कभी दाग़ आये न आँचल में तेरी
आ अपने रूह के दामन में छुपा दूँ,
हो अगर जो कभी राहे दुश्वार तेरी
राहो में तेरी अपनी पलके बिछा दूँ,
आज़माना जो चाहे तू इश्क़ हमारा
कह के देख ख़ुद को सूली चढ़ा दूँ,
वार कर के सब तुम पे ऐ ज़रीन
आ तुझे मैं हर एक दर्द की दवा दूँ..!!
~नवाब ए हिन्द
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ऐ निगाह ए दोस्त ये क्या हो गया, क्या कर दिया…

यूँ वो ज़ुल्मत से रहा दस्त ओ गरेबाँ यारो

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ…

तर्क ए ग़म गवारा है और न ग़म का यारा है

शहर सुनसान है किधर जाएँ

हसीं चेहरों से सूरत आश्नाई होती रहती है

यूँ भरम अपनी अमीरी का बना रखा है

किस ओर ये सफ़र है, संभल जाइए…

मैं एक काँच का पैकर वो शख़्स पत्थर था
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