हिज़ाब तेरे चेहरे पर आ मैं सजा दूँ
बाग़ ए इरम की तुझे मैं हूर बना दूँ,
कभी दाग़ आये न आँचल में तेरी
आ अपने रूह के दामन में छुपा दूँ,
हो अगर जो कभी राहे दुश्वार तेरी
राहो में तेरी अपनी पलके बिछा दूँ,
आज़माना जो चाहे तू इश्क़ हमारा
कह के देख ख़ुद को सूली चढ़ा दूँ,
वार कर के सब तुम पे ऐ ज़रीन
आ तुझे मैं हर एक दर्द की दवा दूँ..!!
~नवाब ए हिन्द
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लोग सह लेते थे हँस कर कभी बेज़ारी भी…

ये दुनिया है यहाँ दिल को लगाना किस को आता है

दूसरा फ़ैसला नहीं होता

गिरह में रिश्वत का माल रखिए

ये इश्क़ के सताए करेंगे लड़ाई ख़ाक

जो मैं भी रूठा तो सुबह तक तू सजी सजाई पड़ी रहेगी

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे

उस के पहलू से लग के चलते हैं

दिल हिज्र के दर्द से बोझल है अब…

आप की आँख से गहरा है मेरी रूह का ज़ख़्म
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