एक वो इतने खूबरू तौबा
उसपे छूने की आरज़ू तौबा !
हाथ काँपेंगे रूह मचलेगी
जब वो आएँगे रूबरू तौबा !
चाँद तारो से रात सजती हुई
तेरी आवाज़ और तू तौबा !
लब नहीं उसकी आँखे बोलती है
ऐसा अंदाज़ ए गुफ़्तगू तौबा…!!
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एक वो इतने खूबरू तौबा
उसपे छूने की आरज़ू तौबा !
हाथ काँपेंगे रूह मचलेगी
जब वो आएँगे रूबरू तौबा !
चाँद तारो से रात सजती हुई
तेरी आवाज़ और तू तौबा !
लब नहीं उसकी आँखे बोलती है
ऐसा अंदाज़ ए गुफ़्तगू तौबा…!!









