दस्त ए पुर ख़ूँ को कफ़ ए दस्त ए निगाराँ समझे
क़त्ल गह थी जिसे हम महफ़िल ए याराँ समझे,
कुछ भी दामन में नहीं ख़ार ए मलामत के सिवा
ऐ जुनूँ हम भी किसे कू ए बहाराँ समझे,
टूटे धागे ही से करते हैं रफ़ू चाक ए जिगर
कौन बेचारगी ए सीना फ़िगाराँ समझे,
हाँ वो बेदर्द तो बेगाना ही अच्छा यारो
जो न तौक़ीर ए ग़म ए दर्द गुसाराँ समझे,
ख़ंदा ज़न उस पे रहे हल्क़ा ए ज़ंजीर ए जुनूँ
जो न कुछ मंज़िलत ए सिलसिला दाराँ समझे,
आज से हम ने भी ज़ख़्मों को तबस्सुम जाना
रज़्म को बज़्म गह ए लाला एज़ाराँ समझे,
तोड़ दें हम जो न तलवार तो कहिए मजरूह
तेग़ ज़न क्या हुनर ए ज़ख़्म शिआराँ समझे..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
मुझ से कहा जिब्रील ए जुनूँ ने ये भी वहइ ए इलाही है
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