उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

usko jaate hue dekha tha pukara tha kahan

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ रोकते किस तरह वो शख़्स हमारा था कहाँ, थी कहाँ

जब भी तुझ को याद किया…

jab bhi tujhko yaad kiya

जब भी तुझ को याद किया ख़ुद को ही नाशाद किया, दिल की बस्ती उजड़ी तो दर्द से

दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था

dard ab wo nahi rahe jo ae dil e nadaan pahle tha

दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था खुले सर पर मेरे भी कभी

देखोगे हमें रोज़ मगर बात न होगी

dekhoge hame roz magar baat na hogi

देखोगे हमें रोज़ मगर बात न होगी एक शहर में रह कर भी मुलाक़ात न होगी, कहना है

नदी में बहते थे नीलम ज़मीन धानी थी

nadee me bahte the neelam zamin dhani thi

नदी में बहते थे नीलम ज़मीन धानी थी तुम्हारे वायदे की रंगत जो आसमानी थी, वफ़ा को दे

आदम की जात होकर इल्म बिसरा रहे हो

aadam ki jaat ho kar ilm bisra rahe

आदम की जात होकर इल्म बिसरा रहे हो क्यूँ मज़लूम ओ गरीब को बेवजह सता रहे हो ?

दूर कर देगा कभी साथ नहीं होने देगा

door kar dega kabhi saath nahi

दूर कर देगा कभी साथ नहीं होने देगा ये वक़्त बेदर्द मुलाक़ात नहीं होने देगा, गम की वो

मैं सुन रहा हूँ जो दुनियाँ सुना रही है मुझे

main sun raha hoo jo duniyan suna rahi hai

मैं सुन रहा हूँ जो दुनियाँ सुना रही है मुझे हँसी तो अपनी ख़ामोशी पे आ रही है

कैसी महफ़िल है ज़ालिम तेरे शहर में…

kaisi mahfil hai zalim tere shahar me

कैसी महफ़िल है ज़ालिम तेरे शहर में यहाँ हर कोई ही डूबा हुआ है ज़हर में, एक बच्ची

चेहरे की हसी भी दिखावट सी हो रही है…

chehre ki hasi bhi dikhawat si ho rahi

चेहरे की हसी भी दिखावट सी हो रही है असल ज़िन्दगी भी बनावट सी हो रही है, अनबन