उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ
रोकते किस तरह वो शख़्स हमारा था कहाँ,
थी कहाँ रब्त में उस के भी कमी कोई मगर
मैं उसे प्यारा था पर जान से प्यारा था कहाँ,
बेसबब ही नहीं मुरझाए थे जज़्बों के गुलाब
तू ने छू कर ग़म ए हस्ती को निखारा था कहाँ,
बीच मझंदार में थे इस लिए हम पार लगे
डूबने के लिए कोई भी किनारा था कहाँ,
आख़िर ए शब मेरी पलकों पे सितारे थे कई
लेकिन आने का तेरे कोई इशारा था कहाँ,
ये तमन्ना थी कि हम उस पे लुटा दें हस्ती
ऐ ज़िया उस को मगर इतना गवारा था कहाँ..!!
~ज़िया ज़मीर
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