सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया

saza pe chhod diya kuch jaza pe chhod diya

सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया हर एक काम को अब मैंने ख़ुदा पे छोड़

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

usko jaate hue dekha tha pukara tha kahan

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ रोकते किस तरह वो शख़्स हमारा था कहाँ, थी कहाँ

जब भी तुझ को याद किया…

jab bhi tujhko yaad kiya

जब भी तुझ को याद किया ख़ुद को ही नाशाद किया, दिल की बस्ती उजड़ी तो दर्द से

दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था

dard ab wo nahi rahe jo ae dil e nadaan pahle tha

दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था खुले सर पर मेरे भी कभी

देखोगे हमें रोज़ मगर बात न होगी

dekhoge hame roz magar baat na hogi

देखोगे हमें रोज़ मगर बात न होगी एक शहर में रह कर भी मुलाक़ात न होगी, कहना है

नदी में बहते थे नीलम ज़मीन धानी थी

nadee me bahte the neelam zamin dhani thi

नदी में बहते थे नीलम ज़मीन धानी थी तुम्हारे वायदे की रंगत जो आसमानी थी, वफ़ा को दे

हमने उसकी आँखे पढ़ ली…

hamne uski aankhe padh li

हमने उसकी आँखे पढ़ ली छुपा कोई चेहरा है शायद ! वो हर बात पे हँस देती है

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे

ham taraste hi taraste hi taraste hi

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले, ख़ुद से

ये मुहब्बतों के किस्से भी अज़ीब होते है

ye muhabbaton ke qisse bhi azib hote..

ये मुहब्बतों के किस्से भी अज़ीब होते है बेवफ़ा ही इसमें अक्सर अज़ीज़ होते है, चाहों में कोई

आदम की जात होकर इल्म बिसरा रहे हो

aadam ki jaat ho kar ilm bisra rahe

आदम की जात होकर इल्म बिसरा रहे हो क्यूँ मज़लूम ओ गरीब को बेवजह सता रहे हो ?