अब इश्क़ तमाशा मुझे दिखलाए है कुछ और
अब इश्क़ तमाशा मुझे दिखलाए है कुछ और कहता हूँ कुछ और मुँह से निकल जाए है कुछ
Sad Poetry
अब इश्क़ तमाशा मुझे दिखलाए है कुछ और कहता हूँ कुछ और मुँह से निकल जाए है कुछ
बैठे तो पास हैं पर आँख उठा सकते नहीं जी लगा है पर अभी हाथ लगा सकते नहीं,
बरहम कभी क़ासिद से वो महबूब न होता गर नाम हमारा सर ए मक्तूब न होता, ख़ूबान ए
मैं ने यूँ इन सर्द लबों को रखा उन रुख़्सारों पर जैसे कोई भूल से रख दे फूलों
ऐ जुनूँ तेरा अभी तक न मुक़द्दर बदला शहर बदला न किसी हाथ का पत्थर बदला, ज़िंदगी बख़्श
राहें वीरान तो उजड़े हुए कुछ घर होंगे दश्त से बढ़ के मेंरे शहर के मंज़र होंगे, यूँ
लिबास तन से उतार देना, किसी को बांहों के हार देना फिर उसके जज़्बों को मार देना, अगर
असर उस को ज़रा नहीं होता रंज राहत फ़ज़ा नहीं होता, बेवफ़ा कहने की शिकायत है तो भी
, गुलों के रुख़ पे वही ताज़गी का आलम है न जाने उन को ग़म ए रोज़गार क्यूँ
और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात ढलते ढलते आप अपनी मौत मर जाएगी रात, ज़िंदगी