मैं जो कहता हूँ तू कजरवी छोड़ दे

main jo kahta hoon tu kajravee chhod de

मैं जो कहता हूँ तू कजरवी छोड़ दे वो ये कहती है तू दोस्ती छोड़ दे, मैं ये

जिसे ख़ुद से जुदा रखा नहीं है

jise khud se juda rakha nahi hai

जिसे ख़ुद से जुदा रखा नहीं है वो मेरा है मगर मेरा नहीं है, जिसे खोने का मुझ

जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद

jisko itna chaha main ne jis ko gazal me likha chaand

जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद छोड़ गया है मुझ को कैसे

सोचता हूँ मैं कि कुछ इस तरह रोना चाहिए

sochta hoon main ki kuch is qadar rona chahiye

सोचता हूँ मैं कि कुछ इस तरह रोना चाहिए अपने अश्कों से तेरा दामन भिगोना चाहिए, ज़िंदगी की

यूँ शहर के बाज़ार में क्या क्या नहीं मिलता

yun shahar ke bazaar me kya kya nahin milta

यूँ शहर के बाज़ार में क्या क्या नहीं मिलता पर हुस्न में सानी कोई तेरा नहीं नहीं मिलता,

रह गया दुनिया में वो बन कर तमाशा उम्र भर

rah gaya duniya me wo ban kar tamasha umr bhar

रह गया दुनिया में वो बन कर तमाशा उम्र भर जिस ने अपनी ज़िंदगी को खेल समझा उम्र

गिरने वाली है बहुत जल्द ये सरकार हुज़ूर

girne wali hai bahut jald ye sarkar huzoor

गिरने वाली है बहुत जल्द ये सरकार हुज़ूर हाँ नज़र आते हैं ऐसे ही कुछ आसार हुज़ूर, कारवाँ

मुसलसल मुझ पे ये तेरी इनायत मार डालेगी

musalsal mujh pe ye teri inayat maar dalegi

मुसलसल मुझ पे ये तेरी इनायत मार डालेगी कभी फ़ुर्क़त कभी इस दर्जा क़ुर्बत मार डालेगी, ग़रीब ए

आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो खुला

aa hi jayegi sahar matla e imkaan to khula

आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो खुला न सही बाब ए क़फ़स रौज़न ए ज़िंदाँ तो

इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए

is baag me wo sang ke qaabil kaha na jaaye

इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मिरा दिल कहा