जिसे ख़ुद से जुदा रखा नहीं है

जिसे ख़ुद से जुदा रखा नहीं है
वो मेरा है मगर मेरा नहीं है,

जिसे खोने का मुझ को डर है इतना
उसे मैं ने अभी पाया नहीं है,

नुक़ूश अब ज़ेहन से मिटने लगे हैं
बहुत दिन से उसे देखा नहीं है,

सुना है फूल अब खिलते नहीं हैं
तो क्या खुल कर वो अब हँसता नहीं है,

नगर छोड़ा है जब से उस ग़ज़ल ने
कोई शाइ’र ग़ज़ल कहता नहीं है,

तेरी यादों से रौशन है मेरा दिल
ये वो सूरज है जो ढलता नहीं है,

मेरी आँखों का ये दरिया अजब है
कि बहता है तो फिर थमता नहीं है,

ख़ुशी का हो कोई या ग़म का लम्हा
गुज़र जाता है क्यों रुकता नहीं है ?

सबीह ओ ख़ूब रू चेहरे कई हैं
मगर कोई भी उस जैसा नहीं है..!!

~सबीहुद्दीन शोऐबी

जिस को इतना चाहा मैं ने जिस को ग़ज़ल में लिखा चाँद

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