अश्क ए नादाँ से कहो बाद में पछताएँगे
अश्क ए नादाँ से कहो बाद में पछताएँगे आप गिर कर मेरी आँखों से किधर जाएँगे ? अपने
Occassional Poetry
अश्क ए नादाँ से कहो बाद में पछताएँगे आप गिर कर मेरी आँखों से किधर जाएँगे ? अपने
चलो चलके मनाया जाए उसको गले से फिर लगाया जाए उसको, सियासत आदमी को बाँटती है ये सच
अक़्ल बड़ी है या फिर भालू दानिश वाले ग़ौर करें शाख़ पे बैठा है क्यों उल्लू दानिश वाले
आदमी ही आदमी के बीच में आने लगा फिर वही गुज़रा ज़माना ख़ुद को दुहराने लगा, एक अदना
मुल्क की ऐसी तरक़्क़ी, आपकी बला से हो जो हो क़ौम की कैसी भी पस्ती, आपकी बला से
पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो फिर कर का बोझ क़ौम की गर्दन डल डाल दो, रिश्वत को
जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो जवार में परधान बनके आ गए अगली क़तार में, दीवार फाँदने में यूँ जिनका
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में, पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों
तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये आँकड़ें झूठे हैं ये दावा किताबी है, उधर
आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे अपने शाहे वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे, देखने