कहानी दर्द ओ गम की ज़िन्दगी से…
कहानी दर्द ओ गम की ज़िन्दगी से क्या कहता ? सबब ए रंज़ ओ गम जो है उसी
Occassional Poetry
कहानी दर्द ओ गम की ज़िन्दगी से क्या कहता ? सबब ए रंज़ ओ गम जो है उसी
किया इश्क था जो बाइसे रुसवाई बन गया यारो तमाम शहर तमाशाई बन गया, बिन माँगे मिल गए
तजुर्बे के दम पर दीवानों ने कहा था इश्क़ बुरा है मगर जुनूँ ए इश्क़ में ये बात
बस एक बार किसी ने गले लगाया था फिर उस के बाद न मैं था न मेरा साया
किस सिम्त चल पड़ी है खुदाई ऐ मेरे ख़ुदा नफ़रत ही दे रही है दिखाई ऐ मेरे ख़ुदा,
हक़ीर जानता है इफ्तिखार माँगता है वो ज़हर बाँटता है और प्यार माँगता है, ज़लील कर के रख
ये बेड़ियाँ मेरे पाँव में तुम पहना तो रहे हो फिर अहद भी ख़ुद ही तोड़ के जा
हालात ए ज़िन्दगी से हुए मज़बूर क्या करे ? ज़ख्म ए ज़िगर भी हो गए नासूर क्या करे
आँखें यूँ बरसीं पैरहन भीग गया तेरे ध्यान में सारा सावन भीग गया, ख़ुश्क महाज़ो बढ़ के मुझे
ये तसव्वुर का वार झूठा है ख़्वाब झूटे हैं सार झूठा है, फूल तुम तोड़ लाए शाख़ों से