तेरे और मेरे बारे में जो मशहूर एक कहानी है

तेरे और मेरे बारे

तेरे और मेरे बारे में जो मशहूर एक कहानी है वही कहानी अब ज़माने के ज़हन से मिटानी

मैं सुबह बेचता हूँ, मैं शाम बेचता हूँ

main subah bechta hoo

मैं सुबह बेचता हूँ, मैं शाम बेचता हूँ नहीं मैं महज़ अपना काम बेचता हूँ, इन बूढ़े दरख्तों

पेड़ मुझे तब हसरत से देखा करते थे

ped mujhe tab hasrat se

पेड़ मुझे तब हसरत से देखा करते थे जब मैं जंगल में पानी लाया करता था, थक जाता

शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा

शोर करूँगा और न

शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा, सारी उम्र इसी ख्वाहिश में

थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का

थक गया है मुसलसल

थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का और अब भी है मेरे शाने पे सर उदासी का, वो

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला

dost ban kar bhi nahi

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला, अब उसे लोग

कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है

कर्ब हरे मौसम को

कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है पतझड़ में तो पात को आख़िर झड़ना पड़ता है,

कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए

कैसे कहे, क्या कहे

कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए हम अल्फाज़ ढूँढ़ते रहे, वो बात अपनी कह गए,

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें

dukh fasana nahi ki

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें, आज तक अपनी

जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए

जंगल काट दिए और

जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए अपने घरो के चिराग़ लोगो ने ख़ुद बुझा दिए,