एक शख्स की खातिर ज़बर कर बैठा हूँ…

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एक शख्स की खातिर ज़बर कर बैठा हूँ मैं ज़िन्दगी को इधर उधर कर बैठा हूँ, उस लम्हे

मेरे ज़ख्मो की हालात को रफूगर जानता है…

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ख़ुदा की कौन सी है राह बेहतर जानता है मज़ा है नेकियों में क्या कलंदर जानता है, बहुत

ऐ निगाह ए दोस्त ये क्या हो गया, क्या कर दिया…

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ऐ निगाह ए दोस्त ये क्या हो गया क्या कर दिया पहले पहले रौशनी दी फिर अँधेरा कर

सुरखाब क्या ख़रीदे असबाब क्या ख़रीदे …

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सुरखाब क्या ख़रीदे असबाब क्या ख़रीदे फ़ितरत फ़कीर जिसकी अलक़ाब क्या ख़रीदे, ले जा इन्हें उठा कर सौदा

फ़लक पे कितना उदास कितना तन्हा…

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फ़लक पे कितना उदास कितना तन्हा कितना बेकस सा लगा हिलाल ए ईद, हम हुजूम ए शहर में

मैं हूँ मेरी चश्म-ए-तर है रात है तन्हाई है…

मैं हूँ मेरी चश्म-ए-तर

मैं हूँ मेरी चश्म-ए-तर है रात है तन्हाई है दर्द मेरा हम-सफ़र है रात है तन्हाई है, जुगनुओं

रवैये मार देते है ये लहज़े मार देते है…

रवैये मार देते है

रवैये मार देते है ये लहज़े मार देते है वही जो जान से प्यारे हैं रिश्ते मार देते

अपनी ज़रूरत के मुताबिक़….

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अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ लोगो के जज़्बात बदल जाते है, इंसानों की इन्हें फिक़र नहीं मगर ये हैवानो

कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती…

कहते हैं ईद है आज

कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती हम को अगर मयस्सर जानाँ की दीद होती, क़ीमत

आये जो वो तो दिल के सब अरमान मचल गए…

आये जो वो तो

आये जो वो तो दिल के सब अरमान मचल गएबुझते हुए चिराग़ ए वफ़ा फिर से जल गए,