इलाज़ ए शीशा ए दिल करूँ मिले…

ilaz e shisha e dil karoon mile jo sishagar koi

इलाज़ ए शीशा ए दिल करूँ मिले जो शीशा गर कोई कोई मिला नहीं इधर, मिलेगा क्या उधर

दर्द मिन्नत कश ए दवा न हुआ…

dard-minnat-kash-e-dawa

दर्द मिन्नत कश ए दवा न हुआ मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ, जमा करते हो क्यूँ

तेरी हर बात चल कर भी यूँ मेरे जी से आती है

तेरी हर बात चल

तेरी हर बात चल कर भी यूँ मेरे जी से आती है कि जैसे याद की ख़ुशबू किसी

समझे वही इसको जो हो दीवाना…

समझे वही इसको जो

समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का अकबर ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का, गर शैख़

कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में…

kahan le jaaoon dil

कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है यहाँ परियों का मजमा है, वहाँ हूरों की

बुझ गई आँख तेरा इंतज़ार करते करते

bujh-gayi-aankh-tera-intazar

बुझ गई आँख तेरा इंतज़ार करते करते टूट गए हम एक तरफ़ा प्यार करते करते, क़यामत है इज़हार

थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी

थे ख़्वाब एक हमारे

थे ख़्वाब एक हमारे भी और तुम्हारे भी पर अपना खेल दिखाते रहे सितारे भी, ये ज़िंदगी है

वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे…

wo gazal walo ka usloob

वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे, इतनी मिलती है मेरी

वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी…

वहशतें बिखरी पड़ी है

वहशतें बिखरी पड़ी है जिस तरफ़ भी जाऊँ मैं घूम फिर आया हूँ अपना शहर तेरा गाँव मैं,

क्या शर्त ए मुहब्बत है, क्या शर्त…

क्या शर्त ए मुहब्बत

क्या शर्त ए मुहब्बत है, क्या शर्त ए ज़माना है ! आवाज़ भी ज़ख़्मी है मगर गीत भी