सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है…

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सब के होते हुए लगता है कि घर ख़ाली है ये तकल्लुफ़ है कि जज़्बात की पामाली है,

खिड़कियाँ खोल रहा था कि हवा आएगी…

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खिड़कियाँ खोल रहा था कि हवा आएगी क्या ख़बर थी कि चिरागों को निगल जाएगी, मुझेको इस वास्ते

मुलाकातें हमारी बेइरादा क्यों नहीं होतीं ?

मुलाकातें हमारी बेइरादा क्यो

मुलाकातें हमारी बेइरादा क्यों नहीं होतीं ? मुहब्बत की गुजर कहीं कुशादा क्यों नहीं होतीं हमारे दरमियान ये

किस की तलाश है किस के असर में हैं…

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किस की तलाश है किस के असर में हैं जब से चले हैं घर से मुसलसल सफ़र में

मेरे दिल के अरमां रहे रात जलते…

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मेरे दिल के अरमां रहे रात जलते रहे सब करवट पे करवट बदलते, यूँ हारी है बाज़ी मुहब्बत

कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ…

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कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ हम भी न डूब जाएँ कहीं ना ख़ुदा के

ये है मयकदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है…

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ये है मयकदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है ये हरम नहीं है ऐ शैख़

न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम…

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न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या

किसी से भी नहीं हम सब्र की तलक़ीन लेते है…

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किसी से भी नहीं हम सब्र की तलक़ीन लेते है हमें मिलती नहीं जो चीज उसको छीन लेते

आँखे बन जाती है सावन की घटा शाम के बाद…

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आँखे बन जाती है सावन की घटा शाम के बाद लौट जाता है अगर कोई खफ़ा शाम के