शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा

शोर करूँगा और न

शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा, सारी उम्र इसी ख्वाहिश में

थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का

थक गया है मुसलसल

थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का और अब भी है मेरे शाने पे सर उदासी का, वो

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला

dost ban kar bhi nahi

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला, अब उसे लोग

कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है

कर्ब हरे मौसम को

कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है पतझड़ में तो पात को आख़िर झड़ना पड़ता है,

कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए

कैसे कहे, क्या कहे

कैसे कहे, क्या कहे इसी कशमकश में रह गए हम अल्फाज़ ढूँढ़ते रहे, वो बात अपनी कह गए,

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें

dukh fasana nahi ki

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें, आज तक अपनी

जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए

जंगल काट दिए और

जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए अपने घरो के चिराग़ लोगो ने ख़ुद बुझा दिए,

पगडंडी पर छाँवो जैसा कुछ नहीं दिखता

pagdandi par chhanvo jaisa

पगडंडी पर छाँवो जैसा कुछ नहीं दिखता गाँवों में अब गाँवों जैसा कुछ नहीं दिखता, कथनी सबकी कड़वी

सीधे सादे से है कुछ पेंच ओ ख़म नहीं रखते

sidhe saade se hai kuch

सीधे सादे से है कुछ पेंच ओ ख़म नहीं रखते जी भर आता है तो रो लेते है

चीखते है दर ओ दीवार नहीं होता मैं

चीखते है दर ओ

चीखते है दर ओ दीवार नहीं होता मैं आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं, ख़्वाब देखना