पूछो अगर तो करते है इन्कार सब के सब…

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पूछो अगर तो करते है इन्कार सब के सब सच ये कि है हयात से बेज़ार सब के

कहीं क़बा तो कहीं आस्तीं बिछाते हुए

कहीं क़बा तो कहीं

कहीं क़बा तो कहीं आस्तीं बिछाते हुए मैं मर गया हूँ वफादारियाँ निभाते हुए, अज़ीब रात थी आँखे

हमारे खून में अब तक ये बीमारी नहीं आई…

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वफ़ादारी पे दे दी जान मगर ग़द्दारी नहीं आई हमारे खून में अब तक ये बीमारी नहीं आई,

वो कौन है जो गम का मज़ा जानते नहीं…

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वो कौन है जो गम का मज़ा जानते नहीं बस दूसरों के दर्द को ही पहचानते नहीं, इस

आवाम भूख से देखो निढाल है कि नहीं ?

आवाम भूख से देखो

आवाम भूख से देखो निढाल है कि नहीं ? हर एक चेहरे से ज़ाहिर मलाल है कि नहीं

बस एक ही हल इसका हमारे पास है लोगो…

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बस एक ही हल इसका हमारे पास है लोगो जो हुक्मराँ बिक जाए वो बकवास है लोगो, किस

चुनाव से पहले मशरूफ़ होते है सारे ही उम्मीदवार…

चुनाव से पहले मशरूफ़

चुनाव से पहले मशरूफ़ होते है सारे ही उम्मीदवार दिन रात मीटिंगे होती है इन सबके प्यादे और

जानते सब है मुझे, पहचानता कोई नहीं…

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आशना होते हुए भी आशना कोई नहीं जानते सब है मुझे, पहचानता कोई नहीं, तन्हा मेरे ज़िम्मे क्यूँ

ज़िन्दा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या…

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ज़िन्दा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या दुनियाँ से ख़ामोशी से गुज़र जाएँ हम

खटकती जो रहे दिल में वो हसरत हम भी रखते है…

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वतन की सर ज़मी से इश्क़ ओ उल्फ़त ही नहीं खटकती जो रहे दिल में वो हसरत हम