कोई दर्द कोई ख़ुशी कोई अरमान अब नहीं…
कोई दर्द कोई ख़ुशी कोई अरमान अब नहीं ज़िस्म तो है मगर जान अब नहीं, जिस कदर था
कोई दर्द कोई ख़ुशी कोई अरमान अब नहीं ज़िस्म तो है मगर जान अब नहीं, जिस कदर था
ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा, अपने साये से चौक जाते है उम्र गुज़री
काँटो की चुभन पे फूलो का मज़ा भी दिल दर्द के मौसम में रोया भी हँसा भी, आने
कुछ भी हो वो अब दिल से जुदा हो नहीं सकते हम मुजरिम ए तौहीन ए वफ़ा हो
जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई उन की निगाह और भी मासूम हो गई, हालात ने किसी
तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा अब के बरस बहार का मौसम न आएगा, चूमूँगा
ज़िंदगी का हर नफ़स मम्नून है तदबीर का वाइज़ो धोखा न दो इंसान को तक़दीर का, अपनी सन्नाई
गर हक़ चाहते हो तो फिर जंग लड़ो गुहार लगाने से कहाँ ये निज़ाम बदलेगा, छाँव ढूँढ़ते हो,
जाने क्यूँ अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते जाने क्यूँ अब मस्त मौला मिजाज़ नहीं होते, पहले
मुफ़लिसी में दिन बिताते है यहाँ फिर भी सपने हम सजाते है यहाँ, मज़हबी बातें उठा कर लोग