वही हुस्न ए यार में है वही लाला ज़ार में है

वही हुस्न ए यार में है वही लाला ज़ार में है
वो जो कैफ़ियत नशे की मय ए ख़ुशगवार में है,

ये चमन की आरज़ू है कोई लूट ले चमन को
ये तमाम रंग ओ निकहत तेरे इख़्तियार में है,

तेरे हाथ की बुलंदी में फ़रोग़ ए कहकशाँ है
ये हुजूम ए माह ओ अंजुम तेरे इंतिज़ार में है,

बस उसी को तोड़ना है ये जुनून ए नफ़अ ख़ोरी
यही एक सर्द ख़ंजर दिल ए रोज़गार में है,

अभी ज़िंदगी हसीं है अभी ज़िक्र ए मौत कैसा
अभी फूल खिल रहे हैं अभी तो कनार में है,

अभी मयकदा जवाँ है अभी मौज में है साक़ी
अभी जाम रक़्स में है अभी मय बहार में है,

यही मेरा शेर ओ नग़्मा यही मेरी फिक्र ओ हिकमत
जो सुरूर ओ दर्द मंदी दिल ए बेक़रार में है..!!

~अली सरदार जाफ़री


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