क्यूँ खौफ़ इस क़दर है तुम्हे हादसात का ?

क्यूँ खौफ़ इस क़दर है तुम्हे हादसात का ?
एक दिन ख़ुदा दिखाएगा रास्ता निज़ात का,

ये तजरुबा बताता है मुझको इस हयात का
भरता नहीं है ज़ख्म कभी कड़वी बात का,

यहाँ बन्दे है सब ख़ुदा के ही बनाये हुए हुज़ूर
फिर झगड़ा ही बे सबब है यहाँ ज़ात पात का,

रूठे हुए सनम को मनाऊँ भला मैं किस तरह ?
जब उसको ऐतबार ही नहीं मेरी किसी बात का,

ऐसा असर कहाँ है किसी और की दुआओं में ?
जैसा शरफ़ हासिल हुआ है माँ के खिदमात का,

राह ए हक़ पे चलना भी नहीं आसान है इतना
हम ने चुना है रास्ता ख़ुद ही इन मुश्किलात का,

बन जाओ इस क़दर मुहिब ए सादिक ओ वफ़ा
सारे फसादात भूला दो आज मज़हब ओ ज़ात का,

रखना हर एक क़दम ज़माने में एहतियात के साथ
क्यूँ कि राह ए ज़िन्दगी एक सफ़र है मुश्किलात का..!!


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