क़दम रखता है जब रास्तो पे यार आहिस्ता आहिस्ता
तो छट जाता है सब गर्द ओ ग़ुबार आहिस्ता आहिस्ता,
भरी आँखों से हो के दिल में जाना सहल थोड़ी है
चढ़े दरियाओं को करते है पार आहिस्ता आहिस्ता,
नज़र आता है तो यूँ देखता जाता हूँ मैं उसको
कि चल पड़ता है जैसे क़ारोबार आहिस्ता आहिस्ता,
इधर कुछ औरतें दरवाजों पर दौड़ी हुई आई
उधर घोड़ो से उतरे शहसवार आहिस्ता आहिस्ता,
किसी दिन कारखाना ए गज़ल में काम निकलेगा
पलट आएँगे सब बेरोज़गार अहिस्ता आहिस्ता,
तेरा पैकर ख़ुदा ने भी तो फ़ुर्सत में बनाया था
बनाएगा तेरे ज़ेवर भी सुनार आहिस्ता आहिस्ता,
मेरी गोशा नशीनी भी एक दिन बाज़ार देखेगी
ज़रूरत कर रही है बेक़रार अहिस्ता आहिस्ता..!!
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