बात करते है यहाँ क़तरे भी समन्दर की तरह
अब लोग ईमान बदलते है कैलेंडर की तरह,
कोई मंज़िल न कोई राह, ना मक़सद ही कोई
है ये लोकतंत्र भी यतीमो के मुक़द्दर की तरह,
अब तो वही लोग बचा सकते है इस कश्ती को
डूब सकते है जो लोग मंझधार में लंगर की तरह,
मैंने ख़ुशबू सा बसाया था जिसे अपने तन मन में
वही बैठा है मेरे पहलू में किसी खंज़र की तरह,
मेरा ये दिल झील के पानी की तरह काँपा था
उसने बात ही कुछ यूँ उछाली कंकर की तरह,
जिनकी ठोकरों से कभी किले काँप के ढह जाते थे
कल की आँधी में उड़े वही लोग छप्पर की तरह..!!
~गोपाल दस नीरज
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