लोग कहते थे वो मौसम ही नहीं आने का
अब के देखा तो नया रंग है वीराने का,
बनने लगती है जहाँ शेर की सूरत कोई
ख़ौफ़ रहता है वहीं बात बिगड़ जाने का,
हमको आवारगी किस दश्त में लाई है कि अब
कोई इम्काँ ही नहीं लौट के घर जाने का,
दिल के पतझड़ में तो शामिल नहीं ज़र्दी रुख़ की
रंग अच्छा नहीं इस बाग़ के मुरझाने का,
खा गई ख़ून की प्यासी वो ज़मीं हमको ही
शौक़ था कूचा ए क़ातिल की हवा खाने का..!!
~अहमद महफूज़
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं










Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



















