क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए
मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,
मुझे जलना पड़ा दीये की तरह
शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,
देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने
नक्श तेरे उभारने के लिए,
मैंने दहलीज पर धरी आँखे
तुझको दिल में उतारने के लिए,
उसने तोहफ़ा दिया उदासी का
वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,
फिर भी इस मुहब्बत के खेल में
मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!!
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अज़ब ही मेरे मुल्क की कहानी है…

जब मुझको सब क़ुबूल था, तुम क्यों चले गए ?

होशियारी ये दिल ए नादान बहुत करता है

मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क़….

कँवल जो वो कनार ए आबजू न हो

मुसलसल मुझ पे ये तेरी इनायत मार डालेगी

अब तुम को ही सावन का संदेसा नहीं बनना

तुम्हारे हाथ से कल हम भी रो लिए साहिब

क्या दौर था फ़ुर्सतों में बस यही काम होना

न मिली छाँव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले…
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