क़र्ज़ जाँ का उतारने के लिए
मैं जीया ख़ुद को मारने के लिए,
मुझे जलना पड़ा दीये की तरह
शब की ज़ुल्फे सँवारने के लिए,
देख ! ख़ुद को मिटा दिया मैंने
नक्श तेरे उभारने के लिए,
मैंने दहलीज पर धरी आँखे
तुझको दिल में उतारने के लिए,
उसने तोहफ़ा दिया उदासी का
वक़्त ख़ुशी ख़ुशी गुज़ारने के लिए,
फिर भी इस मुहब्बत के खेल में
मैं हूँ तैयार उससे हारने के लिए..!!
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अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो

तेरे पैकर सी कोई मूरत बना ली जाएगी

वो हमसफ़र था मगर उससे हम नवाई न थी

कम मयस्सर हो जो होती है उसी की क़ीमत

कभी इस से कभी उस से मिला देता है

किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो

एक मंज़र यूं नजर आया कि मैं भी डर गया…

ऐसे मौसम में भला कौन जुदा होता है

नहीं ऐसे किसी को तड़पाना चाहिए…

चुना था उन की मोहब्बत ने आज़मा के मुझे
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