जो मिला उससे गुज़ारा न हुआ
जो हमारा था, वो हमारा न हुआ,
हम किसी और से मंसूब हुए
क्या ये नुक़सान तुम्हारा न हुआ,
बे तक़ल्लुफ़ भी वो हो सकते थे
मगर हमसे कोई इशारा न हुआ,
दोनों ही एक दूसरे पर मरते रहे
कोई भी अल्लाह को प्यारा न हुआ..!!
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चुप है आग़ाज़ में, फिर शोर ए अजल पड़ता है

अगरचे सब यहाँ सस्ता पड़ेगा

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र…

दिल की इस दौर में क़ीमत नहीं होती शायद

सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद हैं

हालात थे ख़राब या मैं ख़राब था…

अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं…

बीते रिश्ते तलाश करती है…

इश्क़ गर हाथ छुड़ाए तो छुड़ाने देना


















