बने बनाए हुए रास्तों पे जा निकले
ये हमसफ़र मेरे कितने गुरेज़ पा निकले,
चले थे और किसी रास्ते की धुन में मगर
हम इत्तिफ़ाक़ से तेरी गली में आ निकले,
ग़म ए फ़िराक़ में कुछ देर रो ही लेने दो
बुख़ार कुछ तो दिल ए बे क़रार का निकले,
नसीहतें हमें करते हैं तर्क ए उल्फ़त की
ये ख़ैर ख़्वाह हमारे किधर से आ निकले ?
ये ख़ामुशी तो रग ओ पै में रच गई नासिर
वो नाला कर कि दिल ए संग से सदा निकले..!!
~नासिर काज़मी
नसीब ए इश्क़ दिल ए बे क़रार भी तो नहीं
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