सब्ज़ हिकायत सुर्ख़ कहानी

सब्ज़ हिकायत सुर्ख़ कहानी
तेरे आँचल की मेहमानी,

सहज सहज उस हुस्न का चलना
उस पे अंधी शब तूफ़ानी,

एक मिसरा वो जिस्म इकहरा
दूजा मेरे लब दहक़ानी,

जिल्द सुनहरी होंट पियाज़ी
इस पे ख़्वाहिश की अर्ज़ानी,

बालों का घनघोर अंधेरा
उभरी ईंटों की हैरानी,

पिंडली से टकराती पिंडली
उतरन की फ़ित्ना सामानी,

एक लड़की के दूपट्टे पर
हम ने एक रुत है फैलानी,

अंगूरों की बेल से शब भर
बातें करती है वीरानी,

पुश्त ये नील पड़े हों जैसे
जलता है पाताल में पानी,

दो जिस्मों की आँख अनोखी
ख़्वाब और ख़्वाहिश की यकजानी,

ओस के भाले रूह के छाले
छाले सा एक दिल सैलानी,

कैसे दिल मसले जाता है
गदला दिन कौड़ी यर्क़ानी,

एक तावीज़ का सब्ज़ा दिल पर
एक हिकायत रात की रानी,

देख दिलासों वाला कासा
इश्क़ की दमड़ी की हैरानी,

सावन के छज्जे पर आमिर
एक भी बूँद नहीं बारानी..!!

~आमिर सुहैल

कहानियों ने ज़रा खींच कर बदन अपने

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