जब शहर ए दिल में पड़ गए उस ज़र बदन के पाँव

जब शहर ए दिल में पड़ गए उस ज़र बदन के पाँव
पड़ते नहीं ज़मीन पे अब इस चमन के पाँव,

वो कौन आज रातों में घर से निकल पड़ा
उठने लगे हैं शहर की सम्त आज बन के पाँव,

लाओ तो धो दूँ अश्क से वो पाँव मैं ज़रा
तेरी गली से आए हैं उस बरहमन के पाँव,

कहता हूँ दिल में आने को आता नहीं है वो
रखता नहीं है सिल पे वो अपने सनम के पाँव,

आया तो दिल में बैठ गया बन के देवता
उठे नहीं हैं इश्क़ ए दिल ए बुत शिकन के पाँव,

इरफ़ान ए इश्क़ तोड़ दे ज़ंजीर ए फ़े’ल को
रुक जाएँ अपने आप ही आवागवन के पाँव,

अब तक है क़ल्ब ए शम्स से रौशन ये ख़ल्क़ बस
एक बार पड़ गए थे जो शो’ला-बदन के पाँव,

सारे तमद्दुनों का है ख़तरे में अब वजूद
थमते नहीं हैं पर कभी गंग ओ जमन के पाँव..!!

~चंद्रशेखर पाण्डेय शम्स

है ख़ुशी से किस तरह ग़म का ख़सारा देखिए

1 thought on “जब शहर ए दिल में पड़ गए उस ज़र बदन के पाँव”

Leave a Reply