अपने सब यार काम कर रहे हैं
और हम हैं कि नाम कर रहे हैं,
तेग़बाज़ी का शौक़ अपनी जगह
आप तो क़त्ल ए आम कर रहे हैं,
दाद ओ तहसीन का ये शोर है क्यूँ ?
हम तो ख़ुद से कलाम कर रहे हैं,
हम हैं मसरूफ़ ए इंतिज़ाम मगर
जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं,
है वो बेचारगी का हाल कि हम
हर किसी को सलाम कर रहे हैं,
एक क़त्ताला चाहिए हम को
हम ये एलान ए आम कर रहे हैं,
क्या भला साग़र ए सिफ़ाल कि हम
नाफ़ प्याले को जाम कर रहे हैं,
हम तो आए थे अर्ज़ ए मतलब को
और वो एहतिराम कर रहे हैं,
न उठे आह का धुआँ भी कि वो
कू ए दिल में ख़िराम कर रहे हैं,
उस के होंटों पे रख के होंट अपने
बात ही हम तमाम कर रहे हैं,
हम अजब हैं कि उस के कूचे में
बे सबब धूम धाम कर रहे हैं..!!
~जौन एलिया
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो
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