मैं वो दरख़्त हूँ खाता है जो भी फल मेरे
ज़रूर मुझ से ये कहता है साथ चल मेरे,
ये काइनात तसर्रुफ़ में थी रहे जब तक
नज़र बुलंद मेरी फ़ैसले अटल मेरे,
मुझे न देख मेरी बात सुन कि मुझ से हैं
कहीं कहीं मुतसादिम भी कुछ अमल मेरे,
बचा ही क्या हूँ मैं आवाज़ रह गया हूँ फ़क़त
चुरा के रंग तो सब ले गई ग़ज़ल मेरे,
ये तब की बात है जब तुम से राब्ता भी न था
अभी हुए न थे अशआर मुब्तज़ल मेरे,
ये ख़ौफ़ मुझ को उड़ाता है वक़्त के मानिंद
कि बैठने से न हो जाएँ पाँव शल मेरे,
वो दिन थे और न जाने वो कौन से दिन थे
तेरे बग़ैर गुज़रते नहीं थे पल मेरे,
कभी मिलेगा कहीं शहर ए ख़्वाब से बाहर
अगर नहीं तो ख़यालों से भी निकल मेरे,
मैं किस तरह का हूँ ये तू बता नहीं सकता
मगर ये तय है कि हैं यार बे बदल मेरे,
जला हूँ हिज्र के शोलों में बारहा अजमल
मगर मैं इश्क़ हूँ जाते नहीं हैं बल मेरे..!!
~अजमल सिराज
➤ आप इन्हें भी पढ़ सकते हैं










Discover more from Bazm e Shayari :: बज़्म ए शायरी -Hindi / Urdu Poetry, Ghazals, Shayari
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



















