आइए आसमाँ की ओर चलें
आइए आसमाँ की ओर चलें साथ ले कर ज़मीं का शोर चलें, चाँद उल्फ़त का इस्तिआरा है जिस
आइए आसमाँ की ओर चलें साथ ले कर ज़मीं का शोर चलें, चाँद उल्फ़त का इस्तिआरा है जिस
मैं न कहता था कि शहरों में न जा यार मेरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा
ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने अपने होने की ख़बर सब से छुपा ली मैं ने,
सामने तू है लम्हा लम्हा मेरे और ज़मीं आसमां की दूरी है, कोई मंतक, कोई दलील नहीं तू
तारीफ़ उस ख़ुदा की जिसने जहाँ बनाया कैसी हसीं ज़मीं बनाई क्या आसमां बनाया, मिट्टी से बेल बूटे