सर रख कर रोने को शाना चाहिए था…

सर रख कर रोने को शाना चाहिए था
मैं तन्हा था तुझको आना चाहिए था,

आज मैं आया था ख़ुद को परसा देने
मुझको बीच से हट जाना चाहिए था,

महफ़िल मेरी वीरान होती जाती है
हम उम्रो को दोस्त बनाना चाहिए था,

बस एक लम्हा चाहा था दिलदारी का
कौन सा मुझको एक ज़माना चाहिए था ?

आज के दिन अच्छा था घर में रहना ही
वहशत करनी थी, वीराना चाहिए था,

तू भी मेरा ग़म ही बाँटने आया है
यार ! मेरा कुछ तो ध्यान बटाना चाहिए था,

किस को मेरा साथ निभाना आता है ?
तुझको तो मेरा साथ निभाना चाहिए था,

हद से बढ़ कर ज़ब्त नहीं करते साहब
दर्द बहुत था, शोर मचाना चाहिए था..!!

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