सर में जब इश्क़ का सौदा न रहा
क्या कहें ज़ीस्त में क्या क्या न रहा,
अब तो दुनिया भी वो दुनिया न रही
अब तेरा ध्यान भी उतना न रहा,
क़िस्सा ए शौक़ सुनाऊँ किस को ?
राज़दारी का ज़माना न रहा,
ज़िंदगी जिस की तमन्ना में कटी
वो मेरे हाल से बेगाना रहा,
डेरे डाले हैं ख़िज़ाँ ने चौ देस
गुल तो गुल बाग़ में काँटा न रहा,
दिन दहाड़े ये लहू की होली
ख़ल्क़ को ख़ौफ़ ख़ुदा का न रहा,
अब तो सो जाओ सितम के मारो
आसमाँ पर कोई तारा न रहा..!!
~नासिर काज़मी
कल जिन्हें ज़िंदगी थी रास बहुत
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