रखा न अब कहीं का दिल ए बेक़रार ने

रखा न अब कहीं का दिल ए बेक़रार ने
बर्बाद कर दिया ग़म ए बे इख़्तियार ने,

दिल तो कभी का नज़्र किया जाँनिसार ने
एक जाँ है वो भी आप का सदक़ा उतारने,

इस फ़ित्नागर को जीत लिया हार मान कर
क्या क्या मज़ा दिया हमें इस जीत हार ने,

पहलू बदल बदल के मज़े दर्द के लिए
वो करवटें दिखाईं दिल ए बेक़रार ने,

अब ख़्वाब में भी दीद को आँखें तरस गईं
बे ख़्वाब कर दिया ग़म ए शब ज़िंदादार ने,

वो फ़स्ल ए गुल में दिल को जला कर चले गए
इस मर्तबा तो आग लगा दी बहार ने,

ख़ामोश भी हूँ मैं तो मुझे सुन रहे हैं वो
इतना तो कर दिया मेरे दिल की पुकार ने,

सौ सौ तरह की मौत से पाला पड़ा हमें
क्या क्या करम किया है तेरे इंतिज़ार ने,

दुनिया ए नुत्क़ बह गई सैलाब ए अश्क में
पूछा जो हम से हाल किसी ग़मगुसार ने,

नादाँ पुकार उस को जो सुनता है तेरी बात
तू उसको छोड़ किस को चला है पुकारने,

‘कामिल’ निगाह उसकी जमी जिस पे जम गई
चाहा जिसे पसंद किया चश्म ए यार ने..!!

~कामिल शत्तारी

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