रहते थे कभी जिन के दिल में हम
जान से भी प्यारों की तरह,
बैठे हैं उन्ही के कूचे में हम
आज गुनहगारों की तरह,
दावा था जिन्हें हमदर्दी का
ख़ुद आ के न पूछा हाल कभी,
महफ़िल में बुलाया है
हम पे हँसने को सितमगारों की तरह,
बरसों के सुलगते तुम मन पर
अश्कों के तो छींटे दे न सके,
तपते हुए दिल के ज़ख़्मों पर
बरसे भी तो अंगारों की तरह,
सौ रूप भरे जीने के लिए
बैठे हैं हज़ारों ज़हर पिए,
ठोकर न लगाना हम ख़ुद हैं
गिरती हुई दीवारों की तरह..!!
~मजरूह सुल्तानपुरी
मसर्रतों को ये अहल ए हवस न खो देते
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