मुहताज हमसफ़र की मसाफ़त न थी मेरी…

मुहताज हमसफ़र की मसाफ़त न थी मेरी
सब साथ थे किसी से रिफ़ाक़त न थी मेरी,

हक़ किस से माँगता कि मकीनों के साथ साथ
दीवार ओ बाम ओ दर को ज़रूरत न थी मेरी,

सच बोल के भी देख लिया उनके सामने
लेकिन उन्हें पसंद सदाक़त न थी मेरी,

मैं जिनपे मर मिटा था वो काग़ज़ के फूल थे
रस्मी मुकालमे थे मोहब्बत न थी मेरी,

जो दूसरों के दुख थे वही मेरे दुख भी थे
कुछ ऐसी मुख़्तलिफ़ भी हिकायत न थी मेरी,

बस कुछ उसूल थे जो ब हर हाल थे अज़ीज़
जानम किसी से वर्ना अदावत न थी मेरी..!!

~ऐतबार साजिद

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