मोहब्बत एहतिमाम ए दार भी है
मोहब्बत मिस्र का बाज़ार भी है,
मोहब्बत मुस्तक़िल आज़ार भी है
ये गुलशन वादी ए पुर ख़ार भी है,
वो तूफ़ाँ जो डुबो देता है अक्सर
इसी तूफ़ाँ से बेड़ा पार भी है,
ख़ुदी की हद में है मजबूर इंसान
ख़ुदी मिट जाए तो मुख़्तार भी है,
हरीम ए दिल में भी है जल्वा फ़रमा
मेरा यूसुफ़ सर ए बाज़ार भी है,
न क्यों मर जाइए मरने से पहले
यही होना मआल ए कार भी है,
मेरा चाक ए गरेबाँ सीने वाले
ये दिल में ज़ख़्म ए दामन दार भी है,
ज़माने को शिकायत है वफ़ा की
ज़माना ख़ुद वफ़ा बेज़ार भी है,
मेरी नाकामियाँ शाहिद हैं इस की
मैं अब समझा कि तू मुख़्तार भी है,
मेरे दिल की तमन्नाएँ न पूछो
ये नादाँ ‘आफ़ियत बेज़ार भी है,
कोई हद भी वफ़ा के इम्तिहाँ की
सताने का कोई मे’यार भी है,
ये कहती है सदा ए लन तरानी
किसी में ताक़त ए दीदार भी है,
नहीं बहका कभी मख़मूर पी कर
ये दीवाना भी है हुशियार भी है..!!
~मख़मूर देहलवी
रुख़ हर एक तीर ए नज़र का है मेरे दिल की तरफ़
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