लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम
लाश ये किस की लिए फिरते हैं इन हाथों पे हम,
अब उन्हीं बातों को सुनते हैं तो आती है हँसी
बे तरह ईमान ले आए थे जिन बातों पे हम,
कोई भी मौसम हो दिल की आग कम होती नहीं
मुफ़्त का इल्ज़ाम रख देते हैं बरसातों पे हम,
ज़ुल्फ़ से छनती हुई उस के बदन की ताबिशें
हँस दिया करते थे अक्सर चाँदनी रातों पे हम,
अब उन्हें पहचानते भी शर्म आती है हमें
फ़ख़्र करते थे कभी जिनकी मुलाक़ातों पे हम..!!
~जाँ निसार अख़्तर