ख़्वाब के जज़ीरो पर एक दीया जलाना था…

ख़्वाब के जज़ीरो पर एक दीया जलाना था
और फिर हवाओं को रास्ता बताना था,

दर्द की फ़सिलो तक, ये चिराग़ ए जान ले कर
हमसफ़र के धोखे में हमको तन्हा जाना था,

अपने सर की चादर को थाम कर मुझे तन्हा
सर उठा के चलना था, ठोकरे भी खाना था,

उसने रोती आँखों को चूम कर क़सम दी थी
अब तो मुझको जीवन भर सिर्फ़ मुस्कुराना था,

जिसकी सुर्ख ईंटों से नाग लिपटे रहते थे
मुझको उस हवेली में आशियाँ बनाना था,

क्या ख़बर थी बरसों से जल रहा है जो दिल में
उस चिराग़ ने आख़िर मेरा घर जलाना था,

इश्क़ की मुसाफत में बे रिया मुहब्बत को
हमने याद रखना था, तुमने भूल जाना था,

उसका साथ क्या मिलता हम फ़कीर लोगो को !
किस्मतों की बाज़ी में हमको तो हार जाना था,

जीतना ही मुश्किल था, इस सफ़र में तो हमको
एक तरफ मैं तन्हा था, एक तरफ ज़माना था..!!

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