घने बादलो से जो कभी थोड़ी धूप निकलती रहती

घने बादलो से जो कभी थोड़ी धूप निकलती रहती
आसरे उम्मीद के मुमकिन है ज़िन्दगी चलती रहती,

हुस्न ओ अदा के बाज़ार में सुकून जो मिलता अगर
तलाश ए वफ़ा में मुहब्बत ना शहर बदलती रहती,

धोखा फ़ितरत है इंसानी, क्या और सबूत दूँ
हर खूबसुरत चीज पर क्यूँ नज़र फ़िसलती रहती,

मैख़ाने के पास घर हो तो क्या बात है
सुरूर ए हवा से ही ये तबीयत बहलती रहती,

आफ़ताब की किरनो से तो हमने निभा लिया
लेकिन चाँदनी की आँच से ज़िन्दगी पिघलती रहती,

जो मिटा कर वज़ूद रौशन हो जाती महफ़िले
शबनम ना बनती आस सुबह तक जलती रहती..!!


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