रोज़मर्रा वही एक ख़बर देखिए…

रोज़मर्रा वही एक ख़बर

रोज़मर्रा वही एक ख़बर देखिए अब तो पत्थर हुआ काँचघर देखिए, सड़के चलने लगी आदमी रुक गया हो

हम प्यास के मारों का इस तरह गुज़ारा है

ham pyas ke maaro ka

हम प्यास के मारों का इस तरह गुज़ारा है आँखों में नदी लेकिन हाथो में किनारा है, दो

ये दिल टूट न जाए इस बात पर…

ये दिल टूट न

ये दिल टूट न जाए इस बात पर एक तरफ़ा ही ज़ोर लगाया मैंने, मेरे दिल की आवाज़

वो एक लफ़्ज़ जो बेसदा जाएगा….

wo ek lafz jo besada

वो एक लफ़्ज़ जो बेसदा जाएगा वही मुद्दतों तक सुना जाएगा, कोई है जो मेरे तआक़ुब में है

मुक़द्दर ने कहाँ कोई नया पैग़ाम लिखा है

muqaddar ne kahan koi

मुक़द्दर ने कहाँ कोई नया पैग़ाम लिखा है अज़ल ही से वरक़ पर दिल के तेरा नाम लिखा

शरीक ए आलम ए कैफ़ ओ सुरूर….

शरीक ए आलम ए

शरीक ए आलम ए कैफ़ ओ सुरूर मैं भी था कि रात जश्न में तेरे हुज़ूर मैं भी

मुझे तन्हाई के ग़म से बचा लेते तो…

मुझे तन्हाई के ग़म

मुझे तन्हाई के ग़म से बचा लेते तो अच्छा था सफ़र में हमसफ़र अपना बना लेते तो अच्छा

नदी के पार उजाला दिखाई देता है

नदी के पार उजाला

नदी के पार उजाला दिखाई देता है मुझे ये ख़्वाब हमेशा दिखाई देता है, बरस रही हैं अक़ीदत

ज़बाँ है मगर बे ज़बानों में है….

ज़बाँ है मगर बे

ज़बाँ है मगर बे ज़बानों में है नसीहत कोई उसके कानों में है, चलो साहिलों की तरफ़ रुख़

वो सर फिरी हवा थी सँभलना पड़ा मुझे

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वो सर फिरी हवा थी सँभलना पड़ा मुझे मैं आख़िरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे, महसूस कर रहा