जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए

jung jitni ho sake dushwar honi chahiye

जंग जितनी हो सके दुश्वार होनी चाहिए जीत हासिल हो तो लज़्ज़तदार होनी चाहिए, एक आशिक़ कल सलामत

जब इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी…

jab ikkis baras guzre azadi e kamil ko

जब इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी ए कामिल को तब जा के कहीं हमको ‘ग़ालिब’ का ख़याल आया, तुर्बत

सूरमाओं को सर ए आम से डर लगता है

soormaaon ko sar e aam se

सूरमाओं को सर ए आम से डर लगता है अब इंक़लाब को अवाम से डर लगता है, हमीं

इलाज ए ज़ख़्म ए दिल होता है…

इलाज ए ज़ख़्म ए

इलाज ए ज़ख़्म ए दिल होता है ग़मख़्वारी भी होती है मगर मक़्तल की मेरे ख़ूँ से गुलकारी

दुनियाँ में शातिर नहीं अब शरीफ़…

duniyan me shatir nahi

दुनियाँ में शातिर नहीं अब शरीफ़ लटकते है अब सच्चो की बात छोड़ो वो तो सर पटकते है,

रंग ए नफ़रत तेरे दिल से उतरता है…

rang e nafrat tere

रंग ए नफ़रत तेरे दिल से उतरता है कभी ? एक रवैया है मुरव्वत, उसे बरता है कभी

काम उसके सारे ही सय्याद वाले है…

kaam uske saare hi

काम उसके सारे ही सय्याद वाले है मगर मैं उसे बहेलिया नहीं लिखता सर्दियाँ जितनी हो सब सह

जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये…

जो डलहौज़ी न कर

जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे,

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है

ghar me thande chulhe

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है

उनका दावा, मुफ़लिसी का मोर्चा…

unka daava muflisi ka

उनका दावा, मुफ़लिसी का मोर्चा सर हो गया पर हकीक़त ये है मौसम और बदतर हो गया, बंद