दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे
दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे
Occassional Poetry
दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे
कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया फिर हुआ यूँ वो किसी की मैं किसी का
उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ रात के बाद दिन आज के
ज़ीस्त उनवान तेरे होने का दिल को ईमान तेरे होने का, मुझ को हर सम्त ले के जाता
हम ने जिस के लिए फूलों के जहाँ छोड़े हैं उस ने इस दिल में फ़क़त ज़ख़्म ए
बदन पे सूट उर्दू का गले में टाई उर्दू की उन्हें मालूम है गहराई और गीराई उर्दू की,
एक दिन बीवी ने फ़रमाया तुम्हारी हर किताब फ़ालतू सामान है कूड़ा है रद्दी है जनाब, आज कल
नुक़सान हो रहा है बहुत कारोबार में अब्बा पड़े हैं जब से पड़ोसन के प्यार में, सौ कोशिशों
मुझ से फिर मेरी कार तू माँगे एक या दो हज़ार तू माँगे, इस से पहले उधार तू
सुना है रोज़ वो हम को सँवर के देखते हैं ये बात सच है तो उन पे भी