जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए
जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए अपने घरो के चिराग़ लोगो ने ख़ुद बुझा दिए,
Occassional Poetry
जंगल काट दिए और फिर शहर भी जला दिए अपने घरो के चिराग़ लोगो ने ख़ुद बुझा दिए,
पगडंडी पर छाँवो जैसा कुछ नहीं दिखता गाँवों में अब गाँवों जैसा कुछ नहीं दिखता, कथनी सबकी कड़वी
सीधे सादे से है कुछ पेंच ओ ख़म नहीं रखते जी भर आता है तो रो लेते है
चीखते है दर ओ दीवार नहीं होता मैं आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं, ख़्वाब देखना
क़ुबूल है अब तो ज़िन्दगी का हर तोहफ़ा मैंने ख्वाहिशो का नाम बताना छोड़ दिया, जो दिल के
अज़ब क़ातिब है इन्साँ में फ़रावानी नहीं भरता दगाबाज़ी तो भरता है वफ़ादारी नहीं भरता, भरोसा था तभी
गम ए तन्हाई में राहत ए दिल का सबब है एक ये चंचल सी हवा और अँधेरी रात,
सहराओं से आने वाली हवाओं में रेत है हिज़रत करूँगा गाँव से गाँवो में रेत है, ऐ कैस
ये एक बात समझने में रात हो गई है मैं उससे जीत गया हूँ कि मात हो गई
संगदिल कहाँ किसी का गमगुसार करते है ये मुर्दा ज़मीर कब मज़लूमो से प्यार करते है, ना फ़िक्र