अधूरे ख़्वाब की अनोखी ताबीर होती है

adhure khwabo ki anokhi

अधूरे ख़्वाब की अनोखी ताबीर होती है हर हाथों में मुहब्बत की लकीर होती है, जरूरी तो नहीं

किसी दिन तो तू भी मुहब्बत हक़ीक़ी कर के देख

किसी दिन तो तू

किसी दिन तो तू भी मुहब्बत हक़ीक़ी कर के देख कैसे जीते है तेरे बगैर तू भी तो

ऐसे मौसम में भला कौन जुदा होता है

ऐसे मौसम में भला

ऐसे मौसम में भला कौन जुदा होता है जैसे मौसम में तू हर रोज़ खफ़ा होता है, रोज़

तेरे और मेरे बारे में जो मशहूर एक कहानी है

तेरे और मेरे बारे

तेरे और मेरे बारे में जो मशहूर एक कहानी है वही कहानी अब ज़माने के ज़हन से मिटानी

मैं सुबह बेचता हूँ, मैं शाम बेचता हूँ

main subah bechta hoo

मैं सुबह बेचता हूँ, मैं शाम बेचता हूँ नहीं मैं महज़ अपना काम बेचता हूँ, इन बूढ़े दरख्तों

पेड़ मुझे तब हसरत से देखा करते थे

ped mujhe tab hasrat se

पेड़ मुझे तब हसरत से देखा करते थे जब मैं जंगल में पानी लाया करता था, थक जाता

थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का

थक गया है मुसलसल

थक गया है मुसलसल सफ़र उदासी का और अब भी है मेरे शाने पे सर उदासी का, वो

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला

dost ban kar bhi nahi

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला, अब उसे लोग

कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है

कर्ब हरे मौसम को

कर्ब हरे मौसम को तब तक सहना पड़ता है पतझड़ में तो पात को आख़िर झड़ना पड़ता है,

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें

dukh fasana nahi ki

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें, आज तक अपनी