जो हम पे गुज़रे थे रंज़ सारे, जो ख़ुद पे…

जो हम पे गुज़रे थे

जो हम पे गुज़रे थे रंज़ सारे, जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे जब अपनी अपनी मुहब्बतों

नसीम ए सुबह गुलशन में गुलो से खेलती होगी

नसीम ए सुबह गुलशन

नसीम ए सुबह गुलशन में गुलो से खेलती होगी किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी, तुम्हे

किस एहतियात से उसने नज़र बचाई है

किस एहतियात से उसने

किस एहतियात से उसने नज़र बचाई है ज़माना अब भी समझता है आशनाई है, मेरे अज़ीज़ है इसका

उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर

उम्र भर चलते रहे

उम्र भर चलते रहे हम वक़्त की तलवार पर परवरिश पाई है अपने ख़ून ही की धार पर,

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी मैं तो आवाज़ हूँ आवाज़ की हिजरत कैसी ? सुनने वालों

किए वादों का निभाना बाक़ी है

किए वादों का निभाना

किए वादों का निभाना बाक़ी है और अभी उनको मनाना बाक़ी है, मुझे अपना भी समझना बाक़ी है

बात करते है ख़ुशी की भी तो रंज़ के साथ

baat karte hai khushi ki

बात करते है ख़ुशी की भी तो रंज़ के साथ वो हँसाते भी है ऐसा कि रुला देते

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को

कभी कहा न किसी

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को न जाने कैसे ख़बर हो गई ज़माने को, दुआ बहार

साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं

साथ चलते आ रहे

साथ चलते आ रहे हैं पास आ सकते नहीं एक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं,

हुस्न ए मह गरचे बहंगाम ए कमाल अच्छा है

husn e mah garche

हुस्न ए मह गरचे बहंगाम ए कमाल अच्छा है उससे मेरा मह ए ख़ुर्शीद जमाल अच्छा है, बोसा